प्रतिवर्ष विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय द्वारा विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को शांति स्वरूप भटनागर पुरुस्कार दिया जाता है.पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद हर साल की जाने वाली बैठक को संबोधित किया.
पीएम ने इस बैठक में वैज्ञानिकों के कई बेहतरीन कामो की चर्चा की साथ ही कोरोना के इस मुश्किल घडी में देश में जिस प्रकार से रिसर्च का काम हुआ है उसकी तारीफ की इस बैठक मेंबातचीत के बिच में उनोने एक ऐसे व्यक्ति की चर्चा की जिसके बिना भारत की हर खोज का बड़ा भाग अधूरा है.हम बात कर रहे है भारत के महान वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर के बारे में .
प्रतिवर्ष विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय द्वारा विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरीन काम करने वालों को शांति स्वरूप भटनागर पुरुस्कार दिया जाता है.
भटनागर का जन्म 21 फरवरी 1894 को पंजाब के भेड़ा गांव में हुआ था. यह स्थान अब अब पाकिस्तान में है. जिन्हें भारत की शोध प्रयोगशालाओं का जन्मदाता कहा जाता है. इनका भारत के विज्ञान के क्षेत्र के रिसर्च में बड़ा योगदान किया है.शांति भटनागर जब सिर्फ आठ महीने के थेतब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था उनकी परवरिश उनके इंजीनियर नाना ने की और वही से उनके अंदर विज्ञान और प्रोद्यौगिकी जिज्ञासा उठी वे खिलौने, इलेक्ट्रानिक बैटरियां और खोजों में लग गए.
शांति स्वरूप भटनागर सिर्फ वैज्ञानिक नहीं थे बल्कि वह कवि भी थे उन्होने उर्दू और हिंदी में लिखने का काम किया. भटनागर ने उर्दू भाषा में ‘करामाती’ नाम का नाटक लिखा. इस नाटक के अंग्रेजी अनुवाद ने उन्हें ‘सरस्वती स्टेज सोसाइटी’ का साल 1912 का ‘सर्वश्रेष्ठ नाटक’ पुरस्कार और पदक दिलवाया.इसके अलावा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त होकर तीन साल तक पढ़ने का काम किया . बाद में वे पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़ गए और एक अध्यापक के तौर उन्होंने पुरे 19 साल तक शिक्षा जगत की सेवा की.
डॉ भटनागर को नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कारपोरेशन और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की स्थापना के लिए भी उन्हें याद किया जाता है. और उन्होने भारत में टोटल 12 राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं स्थापित कीं, इनमें मैसूर स्थित केंद्रीय खाद्य प्रोसेसिंग प्रौद्योगिकी संस्थान भी शामिल है.
भारत में विज्ञान के विकास में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उनके निधन के बाद सीएसआईआर ने उनकी याद में उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की. यह पुरस्कार हर क्षेत्र के होनहार वैज्ञानिकों को दिया जाता है.
रसायन विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए शांति स्वरूप भटनागर को ब्रिटिश सरकार ने भी सम्मानित किया. 1943 में वे मशहूर रॉयल सोसायटी के फेलो भी चुने गए.शांति स्वरुप ने बीएचयू का कुलगीत भी लिखा था जो हिंदी कविता का बेहतरीन उदाहरण है. यह अलग बात है कि शायद इस विश्वविद्यालय के ही कई छात्र इस बात को न जानते हों.



































